Thursday, June 20, 2019

boondein

बूंदे कितनी भारी हैं आज बारिश की
कितनी जानी पहचानी सी
हथेली में कुछ मिनट खेल के
फिर बह जाती हैं पानी सी

देखती हैं बीते पल इनमें
मुस्क़ुरती आखें मेरी कुछ नम
गीली गीली बूँदें ये अनुरागी
दिल को सेंके मेरे मद्धम

इनकी छम छम में छिपी है
खनकती हँसी प्रिय तुम्हारी
एक रोज़ जब एक टक निहारे हमने
समस्त सहर एक साथ थी गुज़ारी

खिड़की पे बैठी हूँ इन बूंदो को गिनते
सहस्त्र हैं ये जैसे हैं यादें तुम्हारी
कल बारिश से कह दूँगी ना लायें अब यादें
अब कल लाये संग दस्तक तुम्हारी







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