Monday, April 13, 2020

untitled

काफ़िर हूँ
रंज छुपाता हूँ
तेरे दर पे आके
मैं बस मुस्कुराता हूँ

कतरा हूँ
तेरी ही ज़िन्दगी का
दायरों को मानता नहीं
दिल में रहूँगा सदा
मैं कोई अंत जानता नहीं

ज़िद हूँ
कभी तुम्हारे अलफ़ाज़ बनके
कभी तुम्हारी रूह की तहों में
यूँ लुक छिप करके
तुमसे ही मैं बचूँगा

चाहत हूँ
जो पूरी कर लो तो अधूरा रहूँ
और छोड़ना चाहो जो साथ
एक आस बनके तुमको तड़पाऊँ

मैं तुम हूँ कभी
कभी एक अनजान
ढूँढोगी तो भी ना मिलूँगा
बरसों की है तुमसे पहचान
रोज़ उलझन सी ज़िन्दगी को
जब तुम सुलझाओ
मैं वो हूँ
जो देता जाऊं तुम्हें मुस्कान























Saturday, April 11, 2020

hisaab

सिकुड़ी है दुनिया,
मेरी नज़र आजकल बस
मेरे आशिएँ तक की
फ़िर टकरा जाती है
सख़्त निर्जीव दीवारों से
वापस मेरे ही ज़ेहन में,
सिमट, सिकुड़ जाने के लिए

आसमां का टुकड़ा है एक
जैसे हिसाब से दिया मुझे
वही टुकड़ा रोज़ देखती हूँ
गर्दन को लम्बा किये
उसके बदलते रंग निहारती हूँ
उड़ते पंछी रुख करते हैं
कभी कभी इस टुकड़े को ओर
मेरे मन को पुलकित करने के लिए

चाँद रोज़ नहीं दिखता
कभी मुझसे मिलता है
तो कभी मेरे पड़ोसियों से
हिसाब उसको भी आ गया है
पर चाँदनी है अल्हड़
रोज़ मिलके गुदगुदाती है मुझे

कितने हिसाब किये हैं
जीवन भर हमने
आज वही चुकता रहें हैं शायद
टुकड़े जो किये हमने कई बार
उन्ही को समेट रहें हैं अब

नज़र है बेचैन
और श्वास है व्याकुल
किन्तु सूर्य की लालिमा जैसे
रूह अब भी है प्रबल
कि जो पूरा आसमां मिले कल सर पे
हिसाब कर देंगे हम सारे लुप्त
टुकड़ो के फ़लसफ़े पीछे जाएंगे छूट
जो सृष्टि दे हमें जब ऐसा कल 

Tuesday, April 7, 2020

wo awaaz

एक अनजानी आवाज़
दौड़े मेरे कदम... एक दम..
फ़िर ठिठके और ठहरे
मैंने कानों को टटोला
सुना था क्या तुमने सही ?
या यूँ ही ख़यालों की बोलियों
को माना तुमने सच ही

नई सी थी वो आवाज़
पर कुछ थी जानी सी भी
जैसे एक भूली याद
मिलने को मचलती हुई
सोचा मैंने...
राज़ खोल दूँ,  कि जाने दूँ
पर फिर सोचा...
रुकने का नाम नहीं है ज़िन्दगी...

फिर क्या था...
मिनटों की थी दूरी
क्षणों में पार करी
खोला किवाड़ अपने घर का
झट से.... अकड़ के
आखिर हफ्तों बाद
घंटी बजायी थी
मेरे घर की किसी ने ... !!!!