Tuesday, February 11, 2020

raftaar

मैं चलाती ही रही साँसों का कारवाँ
ये ज़िन्दगी ले आई मुझे कहाँ
फलसफा शायद रह गया अधूरा
या फ़िर इसी को कहते हैं
चल हो गया सफर अब पूरा


बहुत लम्बी लिस्ट इच्छाओं की
जो अब भी मेरे मन को है कचोटती
वो जो खुशियाँ सदियों से हैं बटोरी
उनको बांटने को मैं हूँ तरसती


मेरी जेहन में ही हैं क़ैद
अभी तो लम्बे फ़लसफ़े
सोचा था बैठूंगी कागज़ कलम लिए
और बना दूँगी उनको लफ्ज़ सुनहरे


अभी तो बस लगा था थमी है
वक़्त की कुछ रफ़्तार
और मुठ्ठी में आयी है
जीवन की ये धार


मेरे आँगन के हर पौधे को
बताना था मेरा नाम
और सेहला के उनके पत्तों को
पूछना था हौले से मेरे लिए पैगाम


पडोस में झांककर
बनानी थी नयी दोस्तियाँ
फिर कहकहे गूंजती घंटो भर
और बीच में होती मधुर
चाय की चुस्कियाँ


कदमों को आज़ादी का
तोहफ़ा देना है बचा
आजतक तो बस तेज़
रफ़्तार की गिरफ्त में था कारवां


मग़र धागे बहुत उलझे से हैं अब
जैसे मज़बूत जाल एक अनंत
निकलेंगी इससे जो साँसे बदहवाज़
कौन जाने रहेगी तब उनमें कोई श्वास?


















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