थक के बैठी हूं आज शाम
सूर्य की आखिरी लालिमा देखने
पानी पे थिरकते हुए गेरूए रंग को
निशब्द कांति अपनी भेंटते हुए
थक के बैठी हूं आज शाम
दिन भर का हिसाब लिए
बीते घंटों का असमंजस जो बीता नहीं
है उम्मीद फिर भी कल के लिए
थक के बैठी हूं आज शाम
कि तुम भी थे क्या दिन के किसी लम्हें में
संजो के रखूं उसे दिल की तहों में
आने वाली तनहा शामों के लिए
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