Friday, May 8, 2026

थक के बैठी हूं आज शाम

सूर्य की आखिरी लालिमा देखने

पानी पे थिरकते हुए गेरूए रंग को

निशब्द कांति अपनी भेंटते हुए


थक के बैठी हूं आज शाम

दिन भर का हिसाब लिए

बीते घंटों का असमंजस जो बीता नहीं

है उम्मीद फिर भी कल के लिए


थक के बैठी हूं आज शाम

कि तुम भी थे क्या दिन के किसी लम्हें में

संजो के रखूं उसे दिल की तहों में

आने वाली तनहा शामों के लिए

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